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प्रकृति का साथ सबसे बड़ा इलाज है नेचुरोपैथी

admin by admin
28/03/2021
in feature, नारायणीयम आयुर्वेदिक स्कूल से, स्वास्थ्य
0
प्रकृति का साथ सबसे बड़ा इलाज है नेचुरोपैथी

मानव शरीर खुद रोगों से लडऩे में सक्षम होता है बस विधि का ज्ञान होना चाहिए। संसाधनों से समृद्ध प्रकृति से निकटता के जरिए आप सेहतमंद बने रह सकते हैं। तनाव होने पर डॉक्टर भी प्राकृतिक स्थल पर घूमने या बागवानी की सलाह देते हैं।

नेचुरोपैथी यानी प्राकृतिक चिकित्सा उपचार के लिए पंच तत्वों आकाश, जल, अग्नि, वायु और पृथ्वी को आधार मानकर चिकित्सा सम्पन्न की जाती है।

प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति पंच महाभूतत्वों (मिट्टी, पानी, धूप, हवा व आकाश) पर आधारित है। डॉक्टर से सलाह लेकर घर पर ही इलाज संभव है। इसके अंतर्गत जोड़ों का दर्द, ऑर्थराइटिस, स्पॉन्डलाइटिस, सियाटिका, पाइल्स, कब्ज, गैस, एसिडिटी, पेप्टिक अल्सर, फैटी लीवर, कोलाइटिस, माइग्रेन, मोटापा, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, श्वांस रोग, दमा, ब्रॉनकाइटिस, सीओपीडी (क्रॉनिक, ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) व त्वचा संबंधी रोगों का सफलतम उपचार होता है।

मड बाथ, मिट्टी की पट्टी, वेट शीट पैक (गीली चादर लपेट), हॉट आर्म एंड फुट बाथ (गर्म पाद स्नान), सन बाथ (सूर्य स्नान), कटि स्नान, स्टीम बाथ, एनीमा, स्पाइन स्प्रे बाथ, मॉर्निंग वॉक, जॉगिंग के अलावा उपवास, दूध कल्प, फलाहार, रसाहार, जलाहार द्वारा भी इलाज किया जाता है।

आजमगढ़ में बनकट के समीप केशवपुर जंगल के समीप असरफपुर ग्राम में श्री नारायण गुरु स्वामी ट्रस्ट द्वारा नेचरोपैथी का सेण्टर बनाया जा रहा है जो इस ही दिसम्बर में शुरू हो सकता है यहाँ प्रति वर्ष २५ छात्रों को प्रति वर्ष डिप्लोमा बैचलर डिग्री की शिक्षा भी जाएगी 

नेचुरोपैथ वेलनेस सेंटर्स, न्यूटिशन सेंटर, हॉस्पिटल, हेल्थ केयर सेंटर आदि में जॉब तलाश सकते हैं। इसके अतिरिक्त आप एकेडमिक्स, कम्युनिटी हेल्थ सर्विस केयर, सोशल वेलफेयर, मैन्युफैक्चरिंग और नेचुरल प्रॉडक्ट्स कंपनी आदि में भी काम कर सकते हैं। भारत में प्राकृतिक चिकित्सक सरकारी और निजी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में नियुक्त किए जाते हैं। वैसे लग्जरी होटल व हेल्थ रिसॉर्ट में भी नेचुरोपैथ सर्विसेज दी जाती हैं, वहां पर भी जॉब की जा सकती है। इसके अतिरिक्त आप विभिन्न अखबार, मैगजीन में लिख सकते हैं या फिर खुद का यूट्यूब चैनल चलाकर भी अच्छी खासी कमाई कर सकते हैं। एक अनुभवी प्राकृतिक चिकित्सक खुद का सेंटर भी खोल सकता है।

यहां मरीजों को परामर्श के साथ घर पर इलाज करने की जानकारी दी जाती है।

  • जुकाम, खांसी, उल्टी, दस्त जैसे रोगों में तीन दिन तक तरल पदार्थ व एनीमा द्वारा इलाज करते हैं।
  • दस्त होने पर मिट्टी रात भर पानी में भिगोकर सवेरे मरीज की नाभि से चार अंगुल की दूरी पर चारों ओर एक-डेढ़ इंच मोटा लेप लगाकर आधे घंटे बाद उसे हटा दें।
  • घुटने के दर्द में मिट्टी को गर्म पानी में मिलाकर लेप लगाएं। जल चिकित्सा में दर्द व सूजन वाली जगहों पर तौलिये को गर्म पानी में भिगोकर रोग ग्रस्त जगह पर रखने से आराम मिलता है।
  • डिप्रेशन या रीढ़ संबंधी रोगों में ठंडा या गर्म रीढ़ स्नान दिया जाता है।
  • मधुमेह के रोगी को हिप बाथ दी जाती है।
  • बुखार में ऊनी-सूती चादर की लपेट से फायदा मिलता है।
  • विटामिन डी के लिए सूर्य किरण चिकित्सा अपनाएं। डॉक्टर की सलाह के अनुसार रंगीन कांच की शीशी में 21 दिन तक सूर्य तप्त जल व तेल का सेवन भी कई रोगों में फायदेमंद है। इसके अलावा इसमें आहार चिकित्सा भी होती है।
  • क नेचुरोपैथ का मुख्य काम सिर्फ रोगी का इलाज करना ही नहीं होता, बल्कि वह अपने पेशेंट के खानपान और उसके लाइफस्टाइल में भी बदलाव करता है, ताकि व्यक्ति जल्द से जल्द ठीक हो सके।  इतना ही नहीं, एक नेचुरोपैथ को मनोविज्ञान का भी ज्ञान होना चाहिए ताकि वह रोगी की स्थित किो समझकर उसे बेहतर उपचार दे सके।

मिट्टी चिकित्साः-

मिट्टी जिसमें पृथ्वी तत्व की प्रधानता है जो कि शरीर के विकारों विजातीय पदार्थो को निकाल बाहर करती है। यह कीटाणु नाशक है जिसे हम एक महानतम औषधि कह सकते है।

मिट्टी की पट्टी का प्रयोगः- उदर विकार, विबंध, मधुमेह, शि‍र दर्द, उच्च रक्त चाप ज्वर, चर्मविकार आदि रोगों में किया जाता है। पीडित अंगों के अनुसार अलग अलग मिट्टी की पट्टी बनायी जाती है।

वस्ति (एनिमा):- उपचार के पूर्व इसका प्रयोग किया जाता जिससे कोष्ट शुद्धि हो। रोगानुसार शुद्ध जल नीबू जल, तक्त, निम्ब क्वाथ का प्रयोग किया जाता है।

जल चिकित्साः– इसके अन्तर्गत उष्ण टावल से स्वेदन, कटि स्नान, टब स्नान, फुट बाथ, परिषेक, वाष्प स्नान, कुन्जल, नेति आदि का प्रयोग वात जन्य रोग पक्षाद्घात राधृसी, शोध, उदर रोग, प्रतिश्‍याय, अम्लपित आदि रोगो में किया जाता है।

सूर्य रश्मि चिकित्साः- सूर्य के प्रकाश के सात रंगो के द्वारा चिकित्सा की जाती है।यह चिककित्‍सा शरीर मे उष्‍णता बढाता है स्‍नायुओं को उत्‍तेजित करना वात रोग,कफज,ज्‍वर,श्‍वास,कास,आमवात पक्षाधात, ह्रदयरोग, उदरमूल, मेढोरोग वात जन्‍यरोग,शोध चर्मविकार, पित्‍तजन्‍य रोगों में प्रभावी हैं।

उपवास- सभी पेट के रोग, श्वास, आमवात, सन्धिवात, त्वक विकार, मेदो वृद्धि आदि में विशेष उपयोग होता है।

 

 

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