हाल में प्रकाशित एक उच्चकोटि के अध्ययन के अनुसार भारत में वर्ष 1990 में मधुमेह से पीड़ित लोगों की संख्या 26.0 मिलियन थी
जो बढ़कर वर्ष 2016 में 65.0 मिलियन हो गई। वस्तुतः वर्ष 1990 में, 20 वर्ष या उससे अधिक उम्र के वयस्कों में मधुमेह की व्यापकता 5.5 प्रतिशत थी जो वर्ष 1916 में बढ़कर 7.7 प्रतिशत हो गई। भारत में मधुमेह रोगियों की संख्या में बढ़ोत्तरी की वर्तमान दर किसी भी अन्य प्रमुख गैर-संचारी रोग के रोगियों की संख्या में बढ़त-दर से सबसे अधिक है।
कहने का तात्पर्य यह है किसी अन्य प्रमुख गैर-संचारी रोग की तुलना में मधुमेह के रोगियों की संख्या सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ रही है| इस बढ़त में सबसे महत्वपूर्ण जोखिम-कारक मोटापा है, जो कि 2016 में मधुमेह से होने वाली विकलांगता समायोजित जीवन हानि के 36 प्रतिशत के लिये जिम्मेदार है।
वस्तुतः वर्ष 1990 में जहाँ 9.0 प्रतिशत लोग मोटापा-ग्रस्त थे, वहीं वर्ष 2016 में बढ़कर यह आंकड़ा 20.4 प्रतिशत हो गया| यह रुझान देश के हर राज्य में बढ़त की ओर पाया गया है। वर्ष 2016 में भारत में 20 वर्ष या उससे अधिक आयु के प्रत्येक 100 मोटे वयस्कों में 38 वयस्क मधुमेह से पीड़ित थे, जबकि वैश्विक औसत 19 है (द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ, 6, 1352-1362, 2018)। हृदय रोग, श्वसन रोग और मधुमेह मिलकर लगभग 4 मिलियन भारतीयों को सालाना मार डालते हैं| इनमें से अधिकांश की मृत्यु 30-70 वर्ष की आयु में होती है (द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ, 6, 1362-1363, 2018)।
इस सब की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है| दक्षिण एशिया में मधुमेह की देखभाल के लिए कुल वार्षिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लागत 483 से 2637 डॉलर प्रति रोगी है (करेंट डायबिटीज रिपोर्ट्स, जून 2019, 19:34)|
जिस देश में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का उद्भव हुआ और जहाँ इसका 5000 साल का गौरवशाली इतिहास है, उसे आज आज मधुमेह की वैश्विक राजधानी कहा जाने लगा है।
आज की चर्चा का विषय आयुर्वेद के माध्यम से मधुमेह की रोकथाम और नियंत्रण पर केन्द्रित है। मधुमेह पर गहन विश्लेषण की आवश्यकता क्यों पड़ी? असल में चीन के बाद भारत में सर्वाधिक मधुमेह रोगी हैं।
विश्व में मधुमेह के कुल 42 करोड़ रोगियों में से 7 करोड़ से अधिक हमारे देश में होने के कारण भारत को मधुमेह की वैश्विक राजधानी कहा जाने लगा है। इसके साथ ही लगभग 77 लाख लोग मधुमेह से पीड़ित होने की कगार पर हैं, जिन्हें मधुमेह में गिरने से बचाकर कई परिवारों का कल्याण किया जा सकता है। यदि वास्तव में देश के उन नागरिकों को मधुमेह से बचाना है जो आज पीड़ित नहीं हैं, तो सात तथ्यों पर विचार किया जाना और उनसे सीख लेकर जीवन में बदलाव लाना आवश्यक है।
1. मधुमेह रोग के कारण तो पूर्णरूपेण ज्ञात नहीं हैं, फिर भी आम राय यह है कि मधुमेह का एक मुख्य कारण आज की वह जीवनशैली है। परिवार में मधुमेह का इतिहास, मोटापा, बढ़ती उम्र तथा कुछ रोगों के लिये ली जाने वाली औषधियां भी मधुमेह का कारण बनती हैं। निरन्तर मानसिक दबाव में रहने के कारण भी मधुमेह रोग से ग्रसित होने की आशंका बढ़ जाती है। महिलाओं में गर्भावस्था के समय मोटापा एवं मानसिक तनाव बाद में मधुमेह का कारण बन सकता है। हालांकि हमारा विषय यहाँ मधुमेह से बचाव पर केन्द्रित है, तथापि इतना लिखना आवश्यक है कि बायो-मेडिकल साइंस में मधुमेह के पूर्ण उपचार पर शोध अभी जारी है, अभी तो इसे केवल प्रबंधित करना ही संभव हो पाया है। आयुर्वेद चिकित्सा वस्तुतः आहार, जीवन-शैली, रसायन, औषधियों एवं पंचकर्म की सर्वथा वैयक्तिक, अर्थात व्यक्ति-व्यक्ति के लिये पृथक व्यवस्था के द्वारा किया जाता है।
2. मधुमेह एक ऐसा रोग है जिससे बचने के लिये, चिकित्सा की जरूरत पड़े बिना ही, चिकित्सा के प्रथम सिद्धांत, निदान-परिवर्जन, की शरण में जाना पड़ता ह
(सु.उ. 1.25): सङ्क्षेपतः क्रियायोगो निदानपरिवर्जनम्।
अर्थात रोग का कारण समाप्त करना ही चिकित्सा है। तात्पर्य यह हुआ कि ऐसे तमाम कार्य जिनसे स्वस्थ व्यक्ति को मधुमेह हो सकता है, बचा जाये। इन कारकों में प्रज्ञापराध से बचना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है
(च.शा. 1.102): धीधृतिस्मृतिविभ्रष्टः कर्म यत् कुरुतेsशुभम्। प्रज्ञापराधं तं विद्यात् सर्वदोषप्रकोपणम्।।
तात्पर्य यह कि बुद्धि, धैर्य और स्मरण शक्ति के गड़बड़ाने के कारण मनुष्य जब अनुचित काम करता है तब सभी शारीरिक और मानसिक दोष प्रकुपित हो जाते हैं।
(च.शा. 2.40) प्रज्ञापराधो विषमास्तथाऽर्था हेतुस्तृतीयः परिणामकालः। सर्वामयानां त्रिविधा च शान्तिर्ज्ञानार्थकालाः
समयोगयुक्ताः।।
हालाँकि प्रज्ञापराध रोग-जनन का एकल कारक नहीं, बल्कि असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग तथा काल-परिणाम भी रोग-कारक हैं। तथापि, प्रज्ञापराध को सर्वदोषप्रकोपक कहा गया है, क्योंकि रोगजनन के अन्य दो कारक मूलतः प्रज्ञापराध पर निर्भर करते हैं।
उपरोक्त सिद्धांत को वैज्ञानिक शोध-अध्ययनों के प्रकाश में देखें तो अवसाद तो मधुमेह का जोखिम बढ़ाता ही है, सामान्य मानसिक तनाव और चिंता, अनिद्रा, क्रोध, दुश्मनी, ईर्ष्या-जन्य मानसिक जलन आदि एक ओर डायबिटीज-2 के रोगजनन का भारी जोखिम बढ़ा देते हैं। वहीं दूसरी और मधुमेह-पीड़ित व्यक्ति में ये समस्यायें और भड़क जाने से मधुमेह-जनित कई विषमतायें खड़ी हो जाती हैं। अतः मधुमेह रोकने के लिये प्रज्ञापराध से दूर रहना आवश्यक है।
3. अपने आप को बीमार होने से बचाने हेतु आचार्य चरक का सुझाव भी मानना जरूरी है
(च.सं., शा.स्था., 2.46-47): नरो हिताहारविहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः।
दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्तोपसेवी च भवत्यरोगः।
मतिर्वचः कर्म सुखानुबन्धं सत्त्वं विधेयं विशदा च बुद्धिः।
ज्ञानं तपस्तत्परता च योगे यस्यास्ति तं नानुपतन्ति रोगाः।।
तात्पर्य यह है कि हितकर भोजन व जीवन-शैली, समीक्षात्मक दृष्टिकोण, लालच, ईर्ष्या, द्वेष आदि से मुक्त, उदार, समत्व-युक्त, सत्यनिष्ठ, क्षमावान, और महान लोगों के प्रति सेवाभावी व्यक्ति को रोग नहीं होता। इसी प्रकार सुखद मति, मृदुभाषी, सुखानुबंधित, सच्चाई-युक्त, अनुशासित, निष्कपटी बुद्धि वाले, ज्ञान, तप एवं योग में तत्पर व्यक्ति भी रोगों में नहीं पड़ता।
4. आयुर्वेदाचार्यों की सलाह से संतुलित आहार, विहार या जीवन-शैली (दिनचर्या, रात्रिचर्या, ऋतुचर्या), रसायनों व पंचकर्म का समुचित प्रयोग किया जाना उपयोगी रहता है। इसके साथ ही उच्च रक्तचाप व मोटापा नियंत्रित रखना भी आवश्यक है। गुड-कोलेस्ट्रोल को बढ़ाना उपयोगी है। प्रिवेंटिव उपाय के रूप में उच्चकोटि के इम्युनिटी बढ़ाने वाले, एंटीओक्सिडेंट व एंटीइन्फ्लेमेटोरी आयुर्वेदिक रसायन डायबिटीज-2 से बचा सकते हैं।
उदाहरण के लिये त्रिफला की बात करें। ऐसे लोगों का प्रतिशत सांख्यिकीय रूप से नगण्य ही है जो स्वस्थ होने के बावजूद अपने आयुर्वेदाचार्य की सलाह से कुछ वर्षों से त्रिफला का सेवन करते रहे हों, और फिर भी गैर संचारी रोग (हृदय रोग, मधुमेह, कैन्सर, मानसिक रोग आदि) से पीड़ित हो गये हों। त्रिफला के संहिता-वर्णित एवं शोध-समर्थित गुणों का तुलनात्मक अध्ययन बताता है कि त्रिफला लगभग सभी प्रकार के रोगों से बचाव कर सकता है, बशर्ते खान-पान एवं जीवन-शैली संयमित व संतुलित हो, और त्रिफला की गुणवत्ता उच्चकोटि की हो।
5. शरीर की स्थिति को देखते हुये समुचित मात्रा में संतुलित ही आहार लेना चाहिये। पूर्व में खाया हुये भोजन के पच जाने पर, समुचित मात्रा में, ताजा और स्निग्ध भोजन, न बहुत तेज गति से और न बहुत धीमी गति से, तन्मयतापूर्वक भोजन करना चाहिये। भोजन में मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, व कषाय सभी रस वाले खाद्य पदार्थ होना आवश्यक है।
विविध रंगों के मौसमी फल, अनार, द्राक्षा, आँवला, सूखे मेवे, मौसमी सब्जियाँ, गाय का दूध व घी, सैन्धव नमक, लाल चावल आदि नियमित भोजन में लिये जा सकते हैं। मधुमेह की रोकथाम के लिये आयुर्वेद में सुझाये गये कुछ औषधीय पौधे आधुनिक शोध में भी उतने ही प्रभावी पाये गये हैं। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण आंमला, बेल, दालचीनी, गुडूची, हल्दी, जामुन, कैंथ, करैला, सहिजन, मैथी, धनिया, त्रिफला, अश्वगन्धा, कालमेघ, तुलसी, सौंठ, अदरक, कालीमिर्च, जीरा, लहसुन, चना, मूंगदाल, अनार आदि ऐसे द्रव्य हैं जो आहार, रसायन व औषधि के रूप में उपयोगी हैं।
यदि आप भारी मोटापा-ग्रस्त या मोटापा-त्रस्त हैं तो समस्या हालांकि कफ-जनित या मूलतः श्लेष्मिक है, किन्तु केवल कफनाशक उपाय कारगर नहीं होते, बल्कि त्रिदोषशामक चिकित्सा, पथ्य व अन्नपान का युक्ति-व्यपाश्रयी योग प्रयुक्त करना आवश्यक है।
नेवारी या लाल चावल, साँवा, जई, जौ, कोदो, मूंग, कुलथी, अरहर की दाल, परवल, आँवला आदि खाना चाहिये तथा शहद-मिश्रित जल भोजन के बाद अनुपान के रूप में पीना चाहिये। रात्रिजागरण, मैथुन, व्यायाम और चिंतन-मनन को धीरे-धीरे क्रमशः बढ़ाना चाहिये
(च.सू. 21.21-28)। कुशल आयुर्वेदाचार्यों की मदद से मोटापे में कमी लाना संभव है। और हाँ, निकोटीन युक्त पदार्थ, सोडा-युक्त शीतल पेय, लालमांस, सोडियम-संरक्षित मांस, परिष्कृत अनाज, स्टार्च, शक्कर, नमक, और ट्रांस-वसा युक्त खाद्य, आधुनिक पद्धति से सुखाये गये या प्रसंस्कृत फल या फलों के प्रसंस्कृत जूस से सम्मानजनक दूरी बनाने में ही भलाई है।
6. मधुमेह से बचे रहने के लिये समय पर सोना और जागना भी आवश्यक है। मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य ठीक रखने ले लिये कम से कम 7 से 8 घंटे व्यवधान-रहित नींद लेना आवश्यक है। परन्तु, लम्बे समय तक सोते रहना ठीक नहीं है।
7. नियमित व्यायाम, पैदल चलना, सूर्य नमस्कार या मिलते-जुलते व्यायाम, प्राणायाम एवं ध्यान मधुमेह रोकने में बहुत उपयोगी पाये गये हैं। बैठे-बैठे काम करने के बज़ाय हर घंटे के अंतराल में चलते-फ़िरते रहना और हाथ-पांव हिलाते हुये एम्ब्युलेटोरी मूवमेंट्स बढ़ाना दिनचर्या के अंग बनाकर डायबिटीज सहित अनेक बीमारियों से बचा जा सकता है। वैज्ञानिक अध्ययनों के निष्कर्ष बताते हैं कि बच्चों के लिये 60 मिनट प्रतिदिन और वयस्कों के लिये सप्ताह में 150 मिनट व्यायाम होना चाहिये।
लगभग 14 लाख लोगों के मध्य किये गये अध्ययन के आँकड़े बताते हैं कि व्यायाम 26 प्रकार के कैंसर का जोखिम घटाता है। असल में व्यायाम हृदय रोग, डायबिटीज, कैंसर, मनोरोग सहित कम से कम 22 प्रकार के गैर-संचारी रोगों से बचाव की प्रमाण-आधारित औषधि है।
सारांशतः यह कहा जा सकता है कि यदि काम की चिंता किये बिना खूब जम के खाया-पिया जाये, और रातदिन सोया जाये तो जो होना है वह आचार्य चरक ने 3000 साल पहले ही बता दिया है
(च.सू. 21.34): अचिन्तनाच्च कार्याणां ध्रुवं संतर्पणेन च। स्वप्नप्रसङ्गाच्च नरो वराह इव पुष्यति।।
तात्पर्य यह है कि कार्यों की चिंता न करने, संतर्पण करने और खूब सोने से आदमी सुअर की तरह मोटा हो जाता है। ध्यान दीजिये, यहाँ अनुवाँशिक कारणों से होने वाले स्थौल्य की चर्चा नहीं हो रही है। उपयुक्त यही है कि न ज्यादा मोटापा आने दीजिये और न ज्यादा कृशकाय या अत्यंत दुबले रहिये क्योंकि ऐसे लोग सदैव रोगी ही रहते हैं
(च.सू. 21.16): सततं व्याधितावेतावतिस्थूलकृशौ नरौ। सततं चोपचर्यौ हि कर्शनैर्बृंहणैरपि।।
व्यायाम, पैदल चलना, आसन, प्राणायम और ध्यान मानव के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में सुधार करते हैं। शरीर में हल्कापन, कार्य करने की क्षमता, मजबूती, दुःख सहने की क्षमता, शरीर में दोषों की साम्यता, और अग्नि में बढ़ोतरी होती है। कॉर्टीसाल में कमी, रक्तशर्करा में कमी, सिस्टोलिक और डायस्टोलिक रक्तचाप में कमी, हृदय स्वास्थ्य में बढ़ावा, उच्च रक्तचाप में कमी, कॉरोनरी एन्थीरोसिस पर नियंत्रण, सीरम लिक्विड प्रोफाईल में सुधार, हृदय और श्वसन तंत्र की दक्षता में वृद्धि, मधुमेह में कमी, गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार, तनाव, चिन्ता और अवसाद में कमी, मूड में सुधार, और जीवनी-शक्ति में भी सुधार होता है।
प्रज्ञापराध व मनोविकारों से दूर रहते हुये संतुलित आहार-विहार, रसायन, योग, प्राणायाम, ध्यान आदि को अपने जीवन में नियमित रूप से अपना कर डायबिटीज-2 के गम्भीर संकट से बचा जा सकता है। मधुमेह से बचाव के उपायों पर आयुर्वेद की संहितायें और वैज्ञानिक शोध एकमत हैं। आयुर्वेदाचार्यों का ज्ञान व लोगों की इच्छाशक्ति भारत को डायबिटीज की वैश्विक राजधानी होने के कलंक से मुक्ति दिला सकते हैं।
अंततः मधुमेह से बचने के लिये ग्यारह सूत्र सदैव याद रखना उपयोगी होगा
(य.आ.सू. 1.1-11): योगः औषधम्। भोजनं औषधम्। आहारः औषधम्।
भ्रमणं औषधम्। धावनं औषधम्। चङ्क्रमणमौषधम्।
व्यायामः औषधम्। सद्वृत्तं औषधम्। स्वस्थवृत्तं औषधम्।
जीवनशैली औषधम्। रसायनं औषधम्।
तात्पर्य यह है कि योग, आसन, प्राणायम और ध्यान, भोजन-आहार, घूमना, भ्रमण, दौड़ना, चलना-फिरना, व्यायाम, सद्वृत्त, स्वस्थवृत्त, जीवनशैली, और रसायन सभी औषधियाँ हैं, जो मानव के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा एवं सुधार करते हैं। मधुमेह से बचाव के उपायों पर आयुर्वेद की संहितायें और वैज्ञानिक शोध एकमत हैं। संतुलित आहार-विहार, व्यायाम, रसायन, योग, प्राणायाम, ध्यान आदि को अपने जीवन में नियमित रूप से अपना कर डायबिटीज-2 के गम्भीर संकट से बचा जा सकता है।












