किन्नर कैलाश :- हिमालय की बर्फीली चोटियों में कई ऐसे देव स्थान छुपे हैं जिनकी धार्मिक मान्यताएं बहुत हैं। ऐसा ही एक स्थान है हिमाचल में मौजूद किन्नर कैलाश पर्वत जो किन्नौर जिले में स्थित है।
का नाम जेहन में आते ही रोमांच से पुरानी यादें ताज़ी हो जाती है एक ऐसा स्थान जहा मेरे जैसे व्यक्ति आधे दूर ट्रैक कर के हिम्मत हार गया था जबकि इससे खतरनाक ट्रैक को मैंने अकेले पूरा किया था पर किन्नर कैलाश के ट्रैक पे मेरी हाड काँप गयी आपके मेरी सलाह है की यद्दी बहुत तगड़ा आत्म बल हो तभी किन्नर कैलाश के ट्रैक के बारे में सोचेये ही मानिये ये ट्रैक आपके अपने विश्वास, शारीरिक और मानसिक फिटनेस और मजबूत दृढ़ संकल्प के साथ साथ इस्वर की आस्था पाने की ललक की परीक्षा है।
पर यदि आप पहुंच गए तो जो रोमांच का अनुभव आपको होगा वो लिख के आप भी बता नहीं पाएंगे अंततः मेने वो कर दिखाया में पहुंच गया किन्नर कैलाश में जनता हु की आज यदि फिर में जाना चाहू तो सम्बव नहीं होगा पर यदि जीवन मै दुबारा मौका मिले तो जाऊंगा जरूर
किन्नर कैलाश हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में तिब्बत सीमा के समीप स्थित ६०५० मीटर ऊँचा एक पर्वत है जो हिन्दू धर्म में आस्था रखने वालों के लिए विशेष धार्मिक महत्त्व रखता है।
इस पर्वत की विशेषता है इसकी एक चोटी पर स्थित प्राकृतिक शिवलिंग।[
पुरातन काल में लिखित सामग्रियों के अनुसार किन्नौर के वासी को किन्नर कहा जाता है। जिसका अर्थ है- आधा किन्नर और आधा ईश्वर है। आम लोगों के लिए निषेध इस क्षेत्र को 1993 में पर्यटकों के लिए खोल दिया गया, जो 19,849 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यहां 79 फूट ऊंचे चट्टान को हिंदू धर्म वाले शिवलिंग मानते हैं, लेकिन यह हिंदू और बौद्ध दोनों के लिए समान रूप से पूजनीय है।
दोनों समुदायों के लोगों की इसमें गहरी आस्था है। इस शिवलिंग के चारों ओर परिक्रमा करने की इच्छा लिए हुए भारी संख्या में श्रद्धालु यहां पर आते हैं। दरअसल, पहाड़ की चोटी पर स्थित ये शिवलिंग बहुत ही खास है। इस शिवलिंग की खूबसूरती की बात की जाए तो किन्नर कैलाश का ये शिवलिंग बादलों से घिरा रहता है और आस-पास बर्फीले पहाड़ों की चोटियां हैं।
ये शिवलिंग पहाड़ की चोटी पर ये बहुत अच्छी तरह से बैलेंस्ड है। इसकी एक और खास बात ये है कि शिवलिंग बार-बार रंग बदलता रहता है। मान्यता है कि इस शिवलिंग का रंग हर पहर में बदलता है। ये सुबह कुछ और रंग का दिखता है, दोपहर को सूरज की रौशनी में इसका रंग अललग दिखता है और शाम होते होते ये रंग फिर से अलग दिखने लगता है।
मैंने देखा भी है सुबह के समय करीब ११:३० पे में पंहुचा था तो मुझे हल्का नीला सा दिख रहा था वह पहुंचे एक सृद्धालु से जब मैंने पूछा तो उसने बताया की जब वो पंहुचा था तो गाढ़ा नीला राग का नजर आ रहा था दोपहर होते होते पीला रंग का दिख रहा था एक गाइड के अनुसार शाम होते होते सुर्ख लग नजर आता है ये पार्वती कुंड के नजदीक स्थित है और इसलिए भी इसकी मान्यता ज्यादा
क्योंकि ये हिमाचल के दुर्गम स्थान पर स्थित है इसलिए यहां न तो आपको बहुत भीड़ मिलेगी और न ही यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को छेड़ा गया है। ये खूबसूरत ट्रेक मई से अक्टूबर तक ही रहता है। सर्दियों के महीने में यहां बर्फ बहुत ज्यादा होती है और लोग यहां आ नहीं पाते। क्योंकि ये ट्रेक मुश्किल है और इस इलाके में बारिश की काफी समस्या होती है इसलिए यहां मिड मानसून में आने को भी मना किया जाता है।
किन्नर कैलाश पर्वत का ट्रेक काफी मुश्किल माना है। दरअसल, 14 किलोमीटर लंबे इस ट्रेक के आस-पास बर्फीली चोटियां हौ सेब के बागान भी। खूबसूरती की बात करें तो यहां आपको सांग्ला और हंगरंग वैली के नजारे देखने को मिलेंगे।
ट्रेक आपको हिमाचल प्रदेश के किन्नौर क्षेत्र के एक गहरे जंगल में ले जाता है। भारत-तिब्बत सीमा के करीब स्थित हिमाचल का सबसे सुंदर और दूरस्थ क्षेत्र, किन्नौर पवित्र माउंट है। किन्नर कैलाश। तिब्बत में मानसरोवर झील के पास कैलाश पर्वत की ढलान से उठती सतलुज नदी, किन्नौर घाटी से होकर बहती है और अपने शांत और सुरम्य आकर्षण को बढ़ाती है। घाटी की तिब्बत से निकटता के कारण, आपको हिंदू धर्म और बौद्ध संस्कृतियों का एक अनूठा मिश्रण मिलेगा; शिवालय शैली की वास्तुकला और मठ क्षेत्र में काफी सामान्य हैं।
चुकी हम कई दिनों से शिमला मै थे स्थानीय लोगो से किन्नर कैलाश के बाटे मै सुना तो हमने भी ठान लिया की जरूर जायेंगे दूसरे दिन हमने अपनी यात्रा की शुरुवात शिमला से किन्नौर जिला के मुख्यालय रेकांग प्यो जाने के लिए टैक्सी ले ली वैसे बस सुविधा भी उपलब्ध रहती है वैसे आप हवाई मार्ग से भी पहुंच सकते है हवाईजहाज से। निकटतम हवाई अड्डा शिमला में है, जो कल्पा से लगभग 267 किमी दूर है। शिमला हवाई अड्डा दिल्ली और कुल्लू से जुड़ा है। (231 कि.मी., 9 घंटे)। यहां से काल्पा सिर्फ 17 कि.मी.है। इसके बाद थांगी आता है। अभी कल्पा में हूँ और सामने किन्नर कैलाश चोटी भी दिख रही है और शिवलिंग भी। चोटी लगभग 6000 मीटर की ऊँचाई पर है और शिवलिंग लगभग 4800 मीटर पर। यात्रा शिवलिंग की होती है और लोग बताते हैं कि वे चोटी तक की यात्रा करके आए हैं। कुछ समय पहले तक मैं चोटी और शिवलिंग को एक ही मानता था और इसी चिंता में डूबा रहता था कि 6000 मीटर तक जाऊँगा कैसे? दूसरी चिंता ये बनी रहती थी कि वे कौन लोग होते हैं जो 6000 मीटर तक पहुँच जाते हैं?

मैं 4800 मीटर की ऊँचाई तक आराम से जा सकता हूँ और इतनी ऊँचाई पर रात भी रुक सकता हूँ। मैंने पहले भी इतनी ऊँचाई के कई ट्रैक किए हैं, जिनमें रूपकुंड प्रमुख है… लेकिन जैसे ही ऊँचाई 5000 मीटर को पार करती है, मेरी साँसें उखड़ने लगती हैं।
अधिकारियों से पूर्व परमिट लेने के बाद हम निकल पड़े मै और मेरी एक महिला मित्र इस ट्रेक को तांगलिंग गांवसे सुरु किया यही शुरुवाती शुरुआती प्वाइंट है । सतलुज नदी के किनारे बसा ये गांव बहुत ही खास है। यहां से 8 किलोमीटर दूर मलिंग खटा तक ट्रेक कर पंहुचा पर अचानक ही मेरी हालत ख़राब हो गयी मुझे लगने लगा की मै आगे की ट्रैक को पूरा नहीं कर पाउँगा मेरे साथ ट्रैक कर रही मेरी मित्र के अथक उत्साह एव सहयोग के चलते एक घंटे बाद पुनः मैंने ट्रैक शुरू किया
ट्रेक के साथ, खूबसूरत घास के मैदानों, सेब के बागों, लटकते ग्लेशियरों और ऊंची चोटियों के बेजोड़ प्राकृतिक दृश्यों में खुद को रोमांचित करते हुए, विश्वासघाती पगडंडियों , बड़े बोल्डर पर चढ़ें, ढीले बजरी और पत्थरों के साथ संकरे रास्तों पर चढ़ें और बड़े पार करें पानी की धाराएँ को पार करते हुए 5 किलोमीटर दूर पार्वती कुंड तक, वहां के दर्शन करने के बाद 1 किलोमीटर और ट्रेक करने पर किन्नर शिवलिंग पहुंच चूका हु दूर से 79 फीट लंबा शिवलिंग को देखते ही सारी थकान मिट चुकी थी प्रकृति सफ़ेद चादर मै लिपटी नजर आ रही थी दिल यही कह रहा था समय यही रुक जाये हम स्वर्ग मै है हमने जोर से चिल्लाया भी वि आर इन हेवेन
क्योंकि ये ट्रेक बहुत मुश्किल है इसलिए लोगों को सलाह दी जाती है कि वो पूरी तैयारी के साथ यहां आएं और स्थानीय गाइड्स से मदद लें। साथ ही साथ, गर्म कपड़ों की जरूरत यहां हर मौसम में होती है इसलिए ये ध्यान रखें। इस ट्रेक के लिए पहाड़ चढ़ते और उतरते दोनों समय खतरा होता है इसलिए जूते ऐसे ही चुनें जिनमें ग्रिप अच्छी हो।

मधुसूदन नायर
किन्नर कैलाश “मेरी स्वर्ग यात्रा”
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