दुनिया मे इंसान का दिमाग दुर्लभ माना गया है। इसे किसी को ज़हर की खेती करने के लिए लीज़ पर न दें। ये आपका अपना है इसमे वो पैदावार कीजिये जो आपके व दूसरों के काम आ सके नाकि ये विष बन जाए।
एक ऐसा विष जिसे पालते हुए आपको लगेगा कि ये सर्फ दूसरों के लिए ही है लेकिन ये अधूरा झूठ आपको धीरे धीरे निगलता जाएगा और एक दिन आप ज़हरीले और सिर्फ ज़हरीले की पहचान लेकर शेष रह जाएंगे।
झूठ की दुनिया में दाखिला लेने के लिए किसी संस्था तक आपको चलकर जाना नही होता बल्कि आप उसकी तरफ आकर्षित होकर एक मौका देते हैं और वो आपमें समाहित हो जाती है (वैसे आज इस संस्थान में दाखिले के कई दूसरे साधन भी मौजूद हैं जो सीधे डिग्री देते हैं।
अब उनके नाम और प्रकार का ज़िक्र क्या ही करना इतने समझदार तो आप हैं) ऐसा होते ही सम्पूर्ण शरीर मे एक ओज तेज और जोश का संचार महसूस होता है और आपमे झूठ बोलने की वो सारी क़ूवत आ जाती है जिससे आप बड़े से बड़े ज्ञानी सूरमा को धूल चटाने का हौसला रखकर इस नश्वर संसार मे विचरण करने लग जाते हैं, और अब आपका ये विचरण निष्प्रयोज्य नही रह जाता।
ये उधर उधर किधर भी विचरते हुए बस शिकार खोजता रहता है ताकि उसे अपने असीम ज्ञान के सागर में पटखनी देकर आनंद और विजय की अनुभूति कर सके।
एक और बड़ी विशेषता होती है जिसके ज़िक्र के बिना तो सब अधूरा सा लगेगा वो ये कि ऐसे आत्मविश्वासी सत्य के अनुगामी (आप विरोधाभासी मत पढ़ियेगा) को सब हीन और तुच्छ लगने लगते हैं। इनमें लिहाज शर्म संकोच लगाव मोहब्बत का पूर्णतः ह्यास हो जाता है और ये बीती दुनिया के तमाम अविजित योद्धाओं से भी आगे का शौर्य धारण रखने का दम्भ भरते हुए हरदम अपनी भावनाओं के आहत होने का रोना रोकर इसकी परम्आड़ में अपने आत्मविश्वासी व्यक्तित्व (कायर मत पढ़ना) के कायरतापूर्ण कार्यों को पूरे मनोयोग (आप बेशर्मी मत पढ़ना) से आगे बढ़ाते हैं।
ऐसे लीज़पूर्ण लिजलिजे जीवों में अपने-पराये, बड़े-छोटे का भेद नही रहता, ये स्वयं को अभेद्य मानते हैं इसलिए जो भी इनसे सहमत नही हो उन सबसे ये भेद कर जाते हैं भले वो इनका कितना ही अपना क्यों हो।
इस सबमे बड़ी और खास रचनात्मक बात ये है कि इस सम्माननीय असत्य की राह के छात्र में आत्मविश्वास गज़ब का होता है। वो इससे लबरेज़ ही नही होता बल्कि यहां वहां छलकता भी रहता है। वो खोजता रहता है कि कैसे मैं इस ज्ञान को बहाऊँ।
लेकिन वो ये भूल जाता है कि किसी दिन तो इसकी लीज़ यानि मियाद खत्म होगी।
“फिर किसी दिन तो सूरज डूबने का झूठ और सवेरा होने का सच दिमाग मानेगा।”
बस अब उसी दिन का इंतज़ार है जब सूरज खुद आकर गवाही देगा कि वो है!! क्योंकि यहाँ सच से परे अब झूठ की लीज़ पर आत्मविश्वास के साथ बढ़ते जा रहे लोग बिना उसकी गवाही के नही मानने वाले.
जावेद अहमद खान बाराबंकी वाले के फेसबुक वाल से
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