यहीं पर एक चट्टान पर गदा रुपी आकृति उभरी हुई है। इसी से इस जगह का नाम भीम गदा पड़ गया। भागीरथी खर्क ग्लेशियर और बांगलुंग ग्लेशियर जहाँ पर मिलते हैं, उस जगह को ही पुराणों में कुबेर की राजधानी अलकापुरी के नाम से जाना जाता है। अलकनन्दा भी धरती के बाहर यहीं पर से दिखायी देती है। भागीरथी खर्क ग्लेशियर दूर भागीरथी पर्वत श्रृंखलाओं तक फैला पड़ा है। पिछले कुछ वर्षों से ये ग्लेशियर क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से पीछे की ओर खिसक रहा है।
ऐसे में सभी चोटियों के शानदार नज़ारे साफ़-साफ़ दिखाई दे रहे थे। कुछ और आगे तक इसी समतल मैदान के बाद आगे खड़ी चढ़ाई सामने दिख रही थी। चढ़ाई से ठीक पहले हमारे पोर्टरों ने दिन के भोजन के लिए मैगी तैयार कर ली थी। भूख भी जबरदस्त लग रही थी और थकान भी महसूस होने लगी थी। मैगी खाकर शरीर में ऊर्जा आयी तो आज की अन्तिम चढ़ाई के लिए कमर कस ली।
करीब आधा किलोमीटर आगे पहुँचने के बाद चक्रतीर्थ दिखना शुरू हो जाता है।
कटोरे के आकार मैं फैला चक्रतीर्थ सुन्दर बुग्याली मैदान है। कहते हैं भगवान नारायण ने यहाँ पर अपना चक्र रखा था। जिससे इसका आकार ऐसा है। इसीलिये इस जगह को चक्रतीर्थ के नाम से जाना जाता है। अर्जुन ने भी यहीं पर अन्तिम सांस ली थी। आधा किलोमीटर की उतराई के बाद मैदान में प्रवेश किया। शानदार कैम्पिंग स्थल है। चक्रतीर्थ में पानी की अच्छी खासी उप्लब्धतता है। चूँकि हमारे पोर्टरों के रहने के लिए और किचन के लिए हमें गुफा चाहिए थी इसलिए चक्रतीर्थ के अन्त में गुफा के नजदीक जाकर हमको अपने टेण्ट लगाने पड़े।
चक्रतीर्थ में शाम के समय मौसम ख़राब हो गया और बारिश शुरू हो गई। हमारे टेण्ट में ताश की महफ़िल एक बार फिर से जम चुकी थी। अँधेरा होने से पूर्व ही भोजन कर लिया और आराम करने लगे।
बादल भी लगभग पूरी रात रुक-रुक कर बरसते ही रहे। सुबह उजाला होते ही टेण्ट से बाहर निकल आया।
नित्य कर्म से निर्वित होकर मैग्गी बनायीं गयी हमने तो सिर्फ मैग्गी ही कई पर साथियो ने चावल दाल बना खा के ही आगे जाना उचित समझा फिर खा के आगे ट्रैक शुरू हुवा चक्रतीर्थ से सतोपन्थ की दूरी छह किलोमीटर है। चक्रतीर्थ जहाँ समुद्र तल से 4100 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है वहीँ सतोपन्थ 4350 मीटर की ऊँचाई पर।
शुरू के दो सौ मीटर हल्की तिरछी चढ़ाई के बाद एक बार झंडी की ओर देखा, फिर चुपचाप सर झुकाकर चढ़ाई शुरू कर दी। चार से पाँच कदम चलते, साँस फूलने लगती, खड़े हो जाती। पूरे चालीस मिनट तक यही क्रम अपनाने के बाद आखिर झंडी फतह हो गई। झंडी पर पहुँचकर जब दूसरी ओर नजर गई तो समझते देर नहीं लगी कि क्यों पाण्डव इस ट्रैक को पूरा नहीं कर पाए। चक्रतीर्थ धार को कुछ इस तरह बयाँ किया जा सकता है कि तलवार की धार रुपी जगह पर झंडी टाँग दी गई। अब हम दोनों की बारी थी नीचे से चल चुके बाकी साथियों की हालात का जायजा लेने का। इसलिए झंडी पर बैठकर आराम से नीचे के नज़ारे देखने लगे।
झंडी के दूसरी ओर भुरभुरी मिटटी युक्त पचास मीटर की सीधी उतराई थी। उतराई के लक्षण देख कर मुझे लग रहा था कि इस पर कोई ना कोई तो लुढ़केगा जरूर किसी तरह इस उतराई को पार करके दूसरी ओर बैठ गया।
चक्रतीर्थ धार के बाद रास्ता बहुत ही खतरनाक रूप धारण कर लेता है। बड़े-बड़े बोल्डर के नीचे दबी ग्लेशियर की बर्फ कई जगहों पर साफ़ दिखाई पड़ती है। कई स्थानों पर हमारे ठीक नीचे से बहते पानी की आवाज को भी साफ़-साफ़ सुना जा सकता है। रास्ता कुछ नहीं मिलता बस एक पत्थर से दूसरे पत्थर पर उछलते कूदते ही आगे बढ़ना होता है। दो सौ मीटर ही आगे बढे थे कि सामने का नजारा देखकर रोंगटे खड़े हो गए। हमारे ठीक नीचे से ग्लेशियर दरक रहा था। और रह रहकर बड़े पत्थर नीचे खाई में गिर रहे थे। यहाँ से तुरन्त पीछे हट लिए और कुछ दूर से खाई में उतरकर इस हिमस्खलित क्षेत्र को एक-एक कर सावधानी से पार करने लगे। एक नजर ऊपर रखनी पड़ती कि कोई पत्थर कब गिर जाए, और एक नजर सामने वाले पत्थर पर। इस पूरे ट्रैक पर धानु ग्लेशियर के बाद यही क्षेत्र मुझे सबसे खतरनाक लगा। इस क्षेत्र को पार करके सुरक्षित जगह पर बैठकर बाकी साथियों की प्रतीक्षा करने लगे।
धीरे-धीरे सभी साथी सुरक्षित इस ओर पहुँच गए। यहाँ से आगे बढ़ने पर मौसम खुल गया और सभी चोटियों के शानदार नज़ारे देखने को मिलने लगे। यहाँ से नीलकंठ, बानाकुल, पार्वती, चौखम्भा, सतोपन्थ चोटियों के शानदार नज़ारे देखने को मिलते हैं।
कुछ ही आगे पहुँचे थे कि ऊपर से जबरदस्त हिमस्खलन होता हुआ नीचे आया। हम सभी रुककर जीवन में पहली बार हिमस्खलन को प्रत्यक्ष रूप से देख रहे थे। हालाँकि ये उतने बड़े रूप में नहीं था जैसा अक्सर हम टेलीविजन पर देखते हैं। इस क्षेत्र में कई ऐसी जगहों से गुजरना पड़ा जहाँ पर हमारे कदमों के नीचे पानी बहने की आवाज आ रही थी। मैंने ऐसे ही एक छेद में छोठा सा पत्थर डाला तो लगभग तीस सेकेंड तक उसकी नीचे गिरने की आवाज आती सुनाई दी। इससे अनुमान लग रहा था कि अगर गल्ती से ग्लेशियर दरक जाएगा तो क्या होगा। कई जगहों पर तो ग्लेशियर की बर्फ साफ़-साफ़ ऊपर दिखाई पड़ रही थी। मेरा मकसद ये सब बताने का किसी भी पाठक को डराना नहीं है। सिर्फ यही कहना है कि ग्लेशियर क्षेत्र की ऊपरी बनावट को देखकर झांसे में नहीं आना चाहिए। ना मालूम किस पत्थर के नीचे क्या हो। इसलिए ऐसे क्षेत्र में अति सावधानी नितान्त आवश्यक है।
कुछ आगे बढ़ने पर एक छोठी सी धार पर एक झंडी लहराती दिखाई दी। जो भी वहां पर पहुँचता ख़ुशी के मारे चिल्लाने लगता। मुझे लगा यहाँ से कोई शानदार नजारा सामने दिखाई पड़ रहा होगा। इस धार पर पहुँचने के लिए पचास मीटर की खड़ी चढाई को चढ़ना था। एक जोर लगाकर जब मैं भी ऊपर पहुंचा तो सामने का नजारा देखकर आँखों को उससे हटा नहीं पाया। जिस सतोपन्थ को बचपन से तस्वीरों में देखा था आज साक्षात् मेरी आँखों के सामने था।
आज सतोपंत में हमारी टीम के आलावा चार और टीम थी जो आज यहाँ रुकने वाली थी हमने जगह देखकर अपना ठिकाना बना लिया
कुछ देर पश्चात दिन के भोजन के लिए मैगी तैयार हो गई। गर्मागर्म मैगी का आनन्द लेकर, फिर से धूप में पसर गए।
समुद्र तल से ४३५० मीटर की ऊंचाई पर स्थित सतोपन्थ ताल का विशेष महत्व है। सतोपन्थ चोटी के ठीक नीचे गहरे हरे रंग के पानी का यह ताल त्रिभुज आकार में बेहद आकर्षक लगता है। हिन्दू धर्म में इस ताल की बहुत मान्यता है। कहते हैं एकादशी के दिन स्वयं त्रिदेव इस ताल में स्नान हेतु उतरते हैं। गंगा की प्रमुख सहायक नदी अलकनन्दा का उदगम् स्रोत भी इसी ताल को माना जाता है। अक्सर गहरे तालों में नीले रंग का पानी दिखाई प्रतीत होता है। लेकिन इस ताल का पानी गहरे हरे रंग का दिखाई देता है।
हिन्दू धर्म में मान्यता है कि इस पवित्र ताल के किनारे पूजा-पाठ और तर्पण देने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। हर वर्ष कई श्रद्धालु इस कठिन यात्रा को कर यहाँ पहुँचते हैं। हालांकि मेरा उद्देश्य सिर्फ हिमालय की खूबसूरती और वहां की पौराणिक मान्यताओं को देखना और जानना ही रहता है।
वही हमारी मुलाकात अमन बाबा से हुयी वो छह महीने सतोपन्थ में और छह महीने नर्मदा के तट पर ध्यान लगाते हैं। तभी अचानक बारिश शुरू हो गयी भीगने के डर से में भगा अपने टेंट की ओर क्युकी इस सर्द रात में यदि भीग गया तो बुरा हाल हो जायेगा
सुबह उजाला होते ही टेण्ट छोड़ दिया। मौसम अब भी साफ़ नहीं था। लग रहा था कभी भी बारिश हो सकती है।
मन तो कर रहा था की सूर्य कुंड तक जाये परतु शरीर साथ नहीं दे रहा था
सतोपंथ झील से कुछ दूर आगे चलने पर स्वर्गारोहिणी ग्लेशियर नजर आता है। जिसे स्वर्ग जाने का रास्ता भी कहा जाता है। कहा जाता है कि इस ग्लेशियर पर ही सात सीढ़ियां हैं जो कि जो कि स्वर्ग जाने का रास्ता हैं। हालांकि इस ग्लेशियर पर पर अमूमन तीन सीढ़यिां ही नजर आती हैं। बाकी बर्फ और कोहरे की बाकी बर्फ और कोहरे की चादर से ढकी रहती हैं।
वह तक जाना तो बस में नहीं था डर भी लग रहा था की कही धर्मराज की तरह कही रथ न आ जाये औऱ मेरी भी स्वर्ग यात्रा हो जाये इसी डर ने मुझे वापसी की ओर रुख करने पर मजबूर कर दिय है पर एक बात जरूर दिमाक में आयी की यदि ये कथा सत्य है तो कही न कही वादियों में उनके शरीर जरूर होंगे क्युकी इस तापमान में शरीर वर्षो वर्षो तक ख़राब नहीं होते
जीवन यदि रहा तो फिर आऊंगा यह कह कर हम लोग संतोपंथ से अलविदा कहा शरीर में उतनी ही सकती थी की वापस बद्री विशाल तक पहुंच सके जीवन की ये यात्रा आजन्म याद रहेगी
सतोपंथ ताल का लघु यात्रा कार्यक्रम -
पहला दिन- देहरादून से जोशीमठ की ऊंचाई तक ड्राइव करें - टैक्सी से जोशीमठ (256 किमी) (10/11 घंटे) (1,875 मीटर / 6152 फीट)
दिन 2- जोशीमठ से बद्रीनाथ तक टैक्सी से ड्राइव करें (48 किमी) (2/3 घंटे) होटल पहुंचें उचित अनुकूलन की आवश्यकता है
दिन 3- बद्रीनाथ से लक्ष्मीवन तक ट्रेक (08 किमी) (4/5 घंटे) (12,510 फीट)
दिन 4- लक्ष्मीवन से चक्रतीर्थ तक ट्रेक (10 किमी) (5/6 घंटे) (13,655 फीट)
दिन 5- चक्रतीर्थ से सतोपंथ ताल (10 किमी) (8/9 घंटे) (14,755 फीट) वापस कैंप तक ट्रेक करें
दिन 6- चक्रतीर्थ से लक्ष्मीवन तक ट्रेक (10 किमी) (4/5 घंटे)
दिन 7- लक्ष्मीवन से बद्रीनाथ तक माणा गांव से ट्रेक (08 किमी)
दिन 8- बद्रीनाथ से देहरादून तक टैक्सी द्वारा ड्राइव (380 किमी) (11/12 घंटे)
